संदेश

दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अपनी-अपनी मान्यता, वेद और वेदान्त

चित्र
            यद्यपि गीता में वेदों की महिमा का गान मुक्तकंठ से किया गया है जिसमें अध्याय तीन में सर्वाधिक वेदों की महिमा का बखान है, तथापि अध्याय के श्लोक बयालीस से लेकर छियालिस तक वेदों के जिस स्वरूप और विषय का वर्णन किया गया है, साथ ही साङ्ख्य अर्थात ज्ञानयोग का अलग से वर्णन किया गया है जिसे वेदान्त की संज्ञा विद्वानों ने दी है, इससे वेद और वेदान्त में कुछ भिन्नता दिखती है । स्वयं श्रीभगवान ने ‘नाहं वेदैर्न तपसा’ ११/५३ अर्थात वेदों के द्वारा अपनी प्राप्ति नहीं बतायी है, तो जिससे भगवान की प्राप्ति होगी वह मार्ग कोई और होगा ? वह मार्ग है वेदान्त (ब्रह्मविद्या के प्रतिपादक उपनिषद) । अध्याय तेरह में भी छन्द से वेदों को और ब्रह्मसूत्र से वेदान्त को अलग-अलग कहा एवं यदि ‘ऋषिभिर्बहुधा गीतम्’ को अलग कर दें तो इससे ब्राह्मण एवं आरण्यक ग्रंथ भी १३/४ अलग ही वेदों से सिद्ध होते हैं । यहां तक ‘वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्’ १५/१५ अर्थात वेदान्त की रचना करने वाले और वेदों को जानने वाले भी भगवान ही हैं । यहां भी वेदान्त अलग ही कहा गया है । गीता के इन प्रसंगों...

प्राजापत्य,चान्द्रायण व्रत

चित्र
         हमारे शास्त्रों में सबसे कठोर ब्रत प्राजापत्य या चान्द्रायण व्रत को माना गया है जो गौहत्या, ब्रह्महत्या जैसे दुर्दांत पापों के नाश के लिए प्रसिद्ध हैं । लोग अक्सर इन व्रतों के विषय में पूछते रहते हैं, अतः संक्षिप्त विवरण यहां उद्धृत करूंगा— त्र्यहं प्रातस्त्रयहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् । त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन्द्विजः ॥          प्राजापत्य का आचरण करता हुआ द्विज तीन दिन सबेरे,तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना किसी से कुछ मांगे ही जो कुछ मिल जाये उसे ही खावे । इसी को प्राजापत्य व्रत कहते हैं ॥ मनुस्मृति अ.११/२११॥ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः  कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तापनं स्मृतम् ॥           गोमूत्र,गाय का गोबर, गाय का दूध, गाय का दही, गाय का घी, कुश का जल इन सबको मिलाकर भोजन करे, दूसरे दिन उपवास करे इसी को कृच्छ्रसान्तापन व्रत कहते हैं ॥ मनुस्मृति अ.११/२१२॥ एकैकं ग्रासमश्नीयात्त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् । त्र्...