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रोग, कारण और निदान

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रोग, कारण और निदान ~~~~~~~~~~~~~~~ धर्मार्थकाममोक्षाणाम् आरोग्यं मूलमुत्तमम् । तस्मात् रोगापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च ॥              धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का मूल उत्तम आरोग्य है, इसलिये मोक्ष प्राप्ति के लिए भी एवं जीवन रक्षा के लिए भी रोग का नाश कर आवश्यक है ।              हमारे सनातन धर्म में उक्त चार पुरुषार्थ कहे गए हैं । किन्तु इस विषय में ध्यान रखना चाहिए कि अर्थ और काम भी पुरुषार्थ हैं, अतः इनकी ही प्राप्ति करना चाहिए बाकी धर्म और मोक्ष से हमें क्या लेना देना ? ऐसी सोच मनुष्य के पतन का मूल कारण है । यदि धन संग्रह ही पुरुषार्थ होता तो चोर, लुटेरे आदि भी धन संग्रह करते हैं किन्तु यदि यह पुरुषार्थ है तो जेल की हवा क्यों खानी पड़ती है ? यदि स्त्री विषयक काम को ही यहाँ गृहस्थ धर्म का मूल पुरुषार्थ माना जाये तो पशु-पक्षी भी अपनी-अपनी स्त्रियों के साथ पुरुषार्थ से संपन्न हैं, बलात्कारी, व्यभिचारी भी पुरुषार्थ से युक्त हैं फिर उन...

श्रुति सन्देश

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श्रुति संदेश ~~~~~~~ हमारे शरीर की संरचना का आज तक वस्तु स्थिति रूप में आधुनिक विज्ञान का कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं मिलता, किन्तु हमारी वैदिक परंपरा में इसका विस्तृत रूप यथा स्थान वेदों से लेकर पुराणों तक मिलता है । अथर्ववेदीय माण्डू्क्योपनिषद में आत्मैक्य बोध कराने के लिए सात अङ्ग एवं उन्नीस मुखों वाला बताया गया है । जिसका विवेचन आचार्य शंकर अपने भाष्य में― सिर (मूर्धा), नेत्र, प्राण, मुख, उदर, उपस्थ (मूत्रस्थान एवं गुदा के एक साथ समझ लेना चाहिए) एवं पैर । ये सात अङ्ग तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पांच प्राण एवं अन्तःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार) ये उन्नीस मुख कहे हैं । शरीर में मुख की प्रधानता होती है अतः मुख से उन्नीस प्रधान अङ्ग समझना चाहिए ।      अब हम स्वयं शरीर के प्रसिद्ध अङ्गों का निरीक्षण करते हैं । हमारा शरीर वस्तुतः जनसामान्य में नौ द्वारों वाला प्रसिद्ध है― दो नाशा छिद्र, दो कर्ण (कान) छिद्र, दो नेत्र, मुख, लिंग/योनि एवं गुदा । किन्तु यह बहुत कम ही विवेकशील जानते हैं कि हमारे शरीर के द्वारा नौ नहीं बल्कि ग्यार...

त्रिविध रोग

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                संसार का हर प्राणी किसी न किसी रोग से पीड़ित है । ये पीड़ाएं तीन प्रकार की होती हैं― आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक । जिस प्रकार से शरीर में तीन धातुओं वात, कफ एवं पित्त की प्रधानता होती है उसी प्रकार जीव भी उपरोक्त तीन प्रकार की पीड़ाओं की प्रधानता वाला है ।आधिभौतिक वह पीड़ा है जो विभिन्न प्रकार के अनुपयोगी खानपान, रहनसहन आदि के व्यतिक्रम से उत्पन्न रोगों के द्वारा शारीरिक क्लेश होता है, आधिदैविक में सर्प, व्याघ्र, भूकंप, अति वृष्टि, अनावृष्टि आदि, आध्यात्मिक पीड़ा में जीव के अपने अनन्त असीम सुख की प्राप्ति की इच्छा का होना किन्तु उसे प्राप्त न कर पाने की दशा में छटपटाना ।                जीव के मूलतः शारीरिक, मानसिक एवं कर्मज तीन दोष होते हैं जो काम, क्रोध और लोभ के रूप में दिखाई देते हैं । वस्तुतः इन तीनों के मूल में मोह ही कारण है जो अज्ञान की चरम सीमा हैं ― मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला । तिन ते पुनि उपजहिं बहु सूला ।। अ...