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अग्नियां

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अग्नियां : - मेरे द्वारा पहले अनन्त ब्रह्माण्ड की सृष्टियां किस प्रकार हुई थी ? इस पर प्रकाश डालते हुए, उनचास मरुतों के आधार पर ही अग्नि सहित, पृथ्वी, जल एवं आकाश तत्त्व के भी उनचास - उनचास भेद किये थे, (लिंक नीचे दिया जा रहा है) परन्तु कोई प्रमाण नहीं मिल सका था, अब उन्हीं अग्नियों का लिंग पुराण में उनचास होने का प्रमाण तो मिला लेकिन उनके नाम नहीं मिले तथापि प्रयत्न किया है कि उन्हें सामने ला सकूं । यदि किसी भी विद्वान को उनचास अग्नियों के नाम प्राप्त होते हैं तो प्रमाण सहित प्रस्तुत करने की कृपा करें । ओ३म् !) विसृज्य सप्तकं चादौ चत्वारिंशन्नवैव च । इत्येते वह्नयः प्रोक्ताः प्रणीयन्तेऽध्वरेषु च ॥ आदि में सप्तक का त्याग करके कुल उनचास अग्नियां कही गई हैं । ये अग्नियां यज्ञों में आराधित हैं । लिंग पु. पूर्वा.६/३ ।         इस श्लोक के अनुसार यज्ञाग्नियां आवाहनीय, गार्हपत्य एवं दक्षिण ये तीन अग्नियां ही यज्ञ के उपयोग में आती हैं, (इन प्रधान अग्नियों की सहायक तीन अग्नियां भी हैं —सभ्य, आवसथ्य, औपासन) इस आधार पर इन्हीं तीनों अग्नियों के उनचास भेद होने चाहिए, ...

बढ़ते हुए संन्यासियों के हृदयाघात

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बढ़ते हुए संन्यासियों के हृदयाघात ———————————————           मेरे कई संन्यासी मित्र हृदयाघात से परलोक गमन को प्राप्त हो चुके हैं, लेकिन हृदयाघात इतना अधिक बढ़ क्यों रहा है ? स्वयं मुझे भी भविष्य में हृदयाघात की संभावनाएं बढ़ती हुई दिख रही है, क्यों ? जिसके शरीर पर वस्त्र की भांति ढकी हुई बहुत हल्की चमड़ी और अस्थियों से भिन्न कुछ न हो, उसे हृदयाघात का हेतु कोलेस्ट्रॉल (एक प्रकार का कफ) कहां से आ सकता है तथापि स्थिति विचारणीय है, अन्य कोई चिन्ता ऐसी यहां संभव ही नहीं है कि जिससे हृदयाघात हो सके । बहुत विचार करने पर पर कोई निर्णय नहीं मिला । परन्तु आज गीता के महात्म्य का पाठ कर रहा था जिसमें एक श्लोक पढ़— गीताध्ययनशीलस्य प्राणायाम परायणः । नैव हि सन्ति पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ॥           गीता का अध्ययन करने वाले और प्राणायाम परायण वाले को पूर्व जन्म का पाप नहीं लगता है । पूर्व जन्म का पाप जो हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग । अब गीता पाठ तो करता हूं फिर भोग कठोर ।  गलती ...

भाषा और राष्ट्रध्वज में जहर क्यों ?

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भाषा और राष्ट्रध्वज में ज़हर क्यों ? आज एक प्रचलन ही चल गया विरोध करने का, उसका परिणाम क्या होगा इस पर कभी भी विचार नहीं किया जाता है । मैं यद्यपि राजनैतिक न कोई निबंध लिखता हूं और न ही किसी राजनैतिक बहस में भाग लेना पसंद करता हूँ, यहां तक जो राजनीति से संबंधित कुछ लोग मेरी सूची में हैं वे पहले से समझे और मर्यादित हैं, इसलिए हैं । परन्तु जब बात समाज और धर्म के ठेकेदारों द्वारा जब धर्म और सुरक्षा के नाम से धर्म को जहरीला बना दिया जाये,राष्ट्र ध्वज का धर्मध्वज के नाम से अपमान किया जाये, भाषा को धर्म विशेष से जोड़ दिया जाये । ऐसा जब आतंक फैल रहा हो ऐसी स्थिति में आज मैं कुछ अपने अनुभव अवश्य कहना चाहूंगा ।              मैं महाराष्ट्र के वेरुल में था, वहां एक ब्राह्मण देवता अपनी काशी की पढ़ाई की प्रशंसा में बताया कि वहां हिन्दुस्तानियों को नहीं पढ़ाया जाता था, उन्हें मैंने पढ़ाना शुरू किया था । मैंने पूछा कि आप हिन्दुस्तानी नहीं हो ? उन्होंने कहा हिन्दुस्तान तो मात्र उत्तर प्रदेश ही है शेष नहीं । अब आप उन ब्राह्मण देवता से कितना सहमत हैं ? यह एक...

गुलामी तो गुलामी है

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गुलामी तो गुलामी है ——————— आज कोई भी कुछ भी बोलने और लिखने में स्वतंत्र है किन्तु यदि सत्य कहूं तो मेरे बचपन में हिन्दी में ५०% से अधिक उर्दू का प्रयोग हर क्षेत्र में होता था, यद्यपि मैने सुधार तो यहां तक किया कि हिन्दी क्षेत्र के विशेषज्ञ भी सराहना करते हैं, तथापि यदि कोई हिन्दी में उर्दू शब्द का प्रयोग करता है तो वह इस प्रकार सार्वजनिक निंदनीय अथवा उपहास का पात्र कैसे बन सकता है ? क्योंकि वह उसका स्वभाव है, कोई दुराग्रह नहीं । बहुत सारे आज भी ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिसका अधिकांश लोग या तो अर्थ हिन्दी में जानते ही नहीं हैं और यदि जानते भी हैं तो वे इसलिए नहीं बोलते हैं कि सामान्य लोग उसका अर्थ नहीं समझ सकते हैं, अतः वह बोलना निर्दोष है । फिर यदि कोई मेरी इस पोस्ट पर आपत्ति करता है या उर्दू या अंग्रेजी शब्दों को लेकर उपहास करता है तो वह कितना बुद्धिमान है ? इस पर उसे स्वयं को विचार करना होगा, क्योंकि बुद्धिमान वह नहीं है जो बहुत से ऐसे शब्दों को गढ़ता या बोलता है जो जन सामान्य समझ भी न सकें, बल्कि बुद्धिमान वह है जो जन सामान्य को भी उसकी ही भाषा में समझा सके । इतने पर भी यद...

कलियुग में संन्यास वर्जित

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कलियुग में संन्यास वर्जित क्यों ? —————————————— भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर के अन्त में भगवती गीता का उपदेश करते हुए अर्जुन को संन्यास ग्रहण करते हुए कर्म में ही लगाया, क्यों ? क्या अर्जुन मैं वैराग्य नहीं था ? अथवा क्षत्रिय को संन्यास का अधिकार नहीं था ?               अर्जुन को वैराग्य था — देखिए गी. १/३२, १/३५ एवं २/५, संन्यास का अधिकार अधिकार से होता है वह कारण भी २/८ में स्पष्ट है । क्षत्रिय का संन्यास में अधिकार भी है तथापि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संन्यास के लिए रोका, इसका उत्तर अर्जुन के प्रश्न (५/१) के अनुसार स्वयं भगवान गीता के पांचवें अध्याय में देते हैं — ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।  निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥५/३॥            यहां पर संन्यास का लक्षण बताया गया द्वेष और इच्छा का त्याग एवं द्वन्द्व रहित होना । यहां इच्छा से प्रचलित भाषा में राग समझना चाहिए क्योंकि जब किसी वस्तु के प्रति राग यानी आसक्ति होती तभी उसकी प्राप्ति की इच्छा होगी । इस प्रका...