बढ़ते हुए संन्यासियों के हृदयाघात
बढ़ते हुए संन्यासियों के हृदयाघात
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मेरे कई संन्यासी मित्र हृदयाघात से परलोक गमन को प्राप्त हो चुके हैं, लेकिन हृदयाघात इतना अधिक बढ़ क्यों रहा है ? स्वयं मुझे भी भविष्य में हृदयाघात की संभावनाएं बढ़ती हुई दिख रही है, क्यों ? जिसके शरीर पर वस्त्र की भांति ढकी हुई बहुत हल्की चमड़ी और अस्थियों से भिन्न कुछ न हो, उसे हृदयाघात का हेतु कोलेस्ट्रॉल (एक प्रकार का कफ) कहां से आ सकता है तथापि स्थिति विचारणीय है, अन्य कोई चिन्ता ऐसी यहां संभव ही नहीं है कि जिससे हृदयाघात हो सके । बहुत विचार करने पर पर कोई निर्णय नहीं मिला । परन्तु आज गीता के महात्म्य का पाठ कर रहा था जिसमें एक श्लोक पढ़—
गीताध्ययनशीलस्य प्राणायाम परायणः ।
नैव हि सन्ति पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ॥
गीता का अध्ययन करने वाले और प्राणायाम परायण वाले को पूर्व जन्म का पाप नहीं लगता है । पूर्व जन्म का पाप जो हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग । अब गीता पाठ तो करता हूं फिर भोग कठोर । गलती कहां हुई ? गलती यह हुई कि गीता पाठ तो करता हूं लेकिन प्राणायाम नहीं । गीता के अनुसार प्राणायाम ही हमारे शरीर के सभी रोगों का हरण करने वाला है । लेकिन कैसे ?
हम जो भी भोजन करते हैं उसी से हमारे शरीर में स्थित वात, पित्त और कफ नामक तीनों धातुओं की पुष्टि होती है। ये ही तीनो धातुएं हमारे शरीर को पुष्ट या क्षय करती हैं । इन्हीं धातुओं की जब तक समता रहेगी तब तक हम पूर्णतः स्वस्थ होंगे । और इनके विषम होते ही हम अनेक लोगों से ग्रस्त हो जायेंगे । इन तीनों धातुओं के प्रत्येक के पांच पांच भेद होते हुए प्रत्येक का मिश्रण, फिर उनके भेद फिर उनका मिश्रण । इस प्रकार हमारे शरीर में जितनी नाड़ियां है उतने रोग प्रतिक्षण विद्यामान हैं । चूंकि शरीर पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है, अतः उसमें स्थित ये सभी शरीर भी विद्यमान हैं । यही यहां पाप नाम से कहे गये जिनका मात्र प्राणायाम करने से नाश हो जायेगा । यही इस श्लोक में प्राणायाम से कहा गया है । जबकि गीता पाठ हमारे लक्ष्य को स्थिर और समय पर करने के लिए प्रेरित करती है । क्योंकि आज किया, कल नहीं किया । आज सुबह किया कल दोपर को किया, कभी दो चार मात्राओं वाले प्राणायाम से काम चला लिया, तो कभी बत्तीस चौसठ मात्राओं में भी कर लिया । कोई नियम नहीं । यह क्रम और अधिक रोगों को आमंत्रित करता है, ऐसा व्यक्ति कभी स्वस्थ नहीं रह सकता है ।
प्राणायाम को गीता में उपासना का अंग माना गया है — अपाने जुह्वति प्राणम् ४/२९, प्राणापानौ समौ कृत्वा ५/२७, इत्यादि । इस प्रकार मात्र वेदान्त सूत्र रटने से या गीता पढ़ने मात्र से पापों का नाश नहीं होता है जब तक कि उसके कहे गये अंग को भी स्वीकार न किया जाये । प्राणायाम की महिमा को इस बात से भी समझा जा सकता है कि चाहे जो संप्रदाय हो, सब जगह मतभेद मिलेंगे लेकिन प्राणायाम में कोई मतभेद नहीं है, प्राणायाम भी तब संभव है जब उसके अंग यम, नियम, आसन ये तीन अंग पहले मजबूत हो, हम प्राणायाम तो बहुत करते हैं किन्तु पूर्व के तीन में से एक भी अंग बलवान नहीं है, तो फिर प्राणायाम सिद्ध कैसे होगा ? आज योग मार्ग की ये परंपराएं लगभग अदृश्य हैं और जो करते हैं वे भी मनमौजी किताबी या श्रुत के आश्रय से । अतः प्राणायाम के परिपक्व होने का प्रश्न ही नहीं बनता है और जब तक प्राणायाम परिपक्व नहीं होगा तब तक प्रत्याहार भी संभव नहीं है फिर आगे क्या कहा जाये ?
हमें अगर स्वस्थ्य रहना है पूर्व जन्म के पापों का नाश करना है तो गीता के इस श्लोक को समझना ही होगा —
अहं वैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापान समायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१५/१५॥
जितने भी संसार में अन्न (खाने योग्य पदार्थ) हैं वे मात्र चार प्रकार के ही कहे गये हैं — भक्ष्य, भोज्य, लेह्य एवं चोष्य । इन चारों प्रकार के अन्न को पचाती है वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) । अतः जठराग्नि का प्रबल होना आवश्यक है । उसी को यहां प्रबल कैसे बनाया जाये यह सूत्र बताया गया है, और वह सूत्र — प्राण और अपान का समान होना । प्राण यानी श्वास और अपान यानी प्रश्वास । यही प्राणायाम का सर्वोच्च शिखर का दर्शन करता है, तथापि आज हम सभी की स्थिति बड़ी दयनीय है । हम दिखाने के लिए बहुत कुछ करते हैं किन्तु जीवन के लिए कुछ नहीं । हमें भोजन तो युक्ताहारविहारस्य ६/१७ के अनुसार करना ही चाहिए, जबकि प्राणायाम कम से कम बत्तीस मात्रात्मक सोलह प्राणायाम अनिवार्य है, जबकि सामान्य जनों के लिए चौसठ मात्रा तक प्राणायाम की वृद्धि होनी चाहिए । (यतियों के लिए बत्तीस मात्रात्मक सौ प्राणायाम) जब इस प्रकार से आहार संयम (यम) से लेकर प्राणायाम तक का आश्रय लेंगे तब हमें पूर्व जन्म कृत पापों (रोगों) का स्पर्श नहीं होगा ।
यद्यपि इतना परिश्रम करना ही चाहिए तथापि यदि नहीं कर सकते हैं तो यतियों (वीतरागियों) को उचित है कि कम से कम खानपान में तो शास्त्र के अनुसार सावधान रहना चाहिए । शास्त्र के अनुसार यतियों के लिए खानपान का विधान क्या है ? इसे इस प्रकार समझना चाहिए —
घृतं श्वमूत्रसदृशं मधु स्यात्सुरया समं ।
तैलं शूकरमूत्रं स्यात्सूपं लशुनसंमितम् ॥
माषापूपादि गोमांसं क्षीरं मूत्रसमं भवेत् ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन घृतादीन्वर्जयेद्यतिः ॥संन्यासोपनिषद॥
इसका अर्थ करना मैं उचित नहीं समझता, इस प्रकार यहां देखना चाहिए कि उक्त पदार्थों को खाने के लिए क्यों मना किया गया है इस पर विचार अवश्य करना चाहिए । वे सभी गरिष्ठ पदार्थ हैं, प्राणायाम होता नहीं, शारीरिक फावड़ा कुदाल आदि जैसा भी परिश्रम होता नहीं और खायेंगे उपरोक्त पदार्थ तो होगा क्या, हृदयाघात, विभिन्न प्रकार के रोग स्वाभाविक होंगे, उन्हें कोई रोक नहीं सकता है । जिन वस्तुओं के लिए जितनी कठोरता से त्याज्य कहा गया है वे उतनी ही अधिक हानिकारक हैं । अतः त्याज्य हैं ।
अब कोई कह सकता है कि यतिजनों को भिक्षा में तो उक्त सभी वस्तुएं तो स्वभाव से ही मिलती हैं, ऐसी स्थिति में उनका त्याग कैसे संभव है ? तब उसके लिए यह समझना चाहिए कि जो स्वपाकी हैं, उनके लिए उक्त बाधाओं का प्रश्न ही नहीं है । अतः वह बच सकता है । अब जो मधुकरी का जीवन व्यतीत करते हैं उनके लिए उचित है कि वे एक ही घर की भिक्षा ग्रहण न करें —
चरेन्माधुकरं भैक्षं यतिर्म्लेक्षकुदपि ।
एकान्नं न भक्षेत बृहस्पतिसमादपि ॥
भले ही वह म्लेक्ष कुल की भी भिक्षा ग्रहण कर ले किन्तु देवगुरु बृहस्पति के समान भी सिद्ध हो उस एक की भिक्षा न ले । पांच सात घर से ही मधुकरी भिक्षा ग्रहण करे,तो निश्चित ही भिन्न भिन्न प्रकार का भोजन प्राप्त होगा और कभी कम तो कभी भरपेट मिलेगा, फलस्वरूप वह भी उसका भी स्वास्थ्य अधिक प्रभावित नहीं होगा बस शर्त ये है कि भोजन की मात्र निश्चित ही उचित रखे,भले भूखा रह जाये लेकिन अधिक न खाये तो ऐसी स्थिति में “सर्वरोग हरीक्षुधा” अर्थात क्षुधा सभी रोगों का हरण कर लेती है । और उपरोक्त मिली हुई वस्तुओं का दोष भी नहीं लगेगा । इस प्रकार हृदयाघात जैसे घातक रोगों से लेकर सामान्य रोगों तक विशेष रूप से बचे रहेंगे, यही पापों के स्पर्श से दूर रहना है । परन्तु आज के समय में यह परंपरा ही चल गई है — योग से दूरी बनाकर रहने की, परंपरा का लुप्त हो जाना ही आज समस्त समस्यों की जड़ है । इस समस्या का निवारण अत्यंत कठिन है । ओ३म् !
स्वामी शिवाश्रम
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