भाषा और राष्ट्रध्वज में जहर क्यों ?

भाषा और राष्ट्रध्वज में ज़हर क्यों ?
आज एक प्रचलन ही चल गया विरोध करने का, उसका परिणाम क्या होगा इस पर कभी भी विचार नहीं किया जाता है । मैं यद्यपि राजनैतिक न कोई निबंध लिखता हूं और न ही किसी राजनैतिक बहस में भाग लेना पसंद करता हूँ, यहां तक जो राजनीति से संबंधित कुछ लोग मेरी सूची में हैं वे पहले से समझे और मर्यादित हैं, इसलिए हैं । परन्तु जब बात समाज और धर्म के ठेकेदारों द्वारा जब धर्म और सुरक्षा के नाम से धर्म को जहरीला बना दिया जाये,राष्ट्र ध्वज का धर्मध्वज के नाम से अपमान किया जाये, भाषा को धर्म विशेष से जोड़ दिया जाये । ऐसा जब आतंक फैल रहा हो ऐसी स्थिति में आज मैं कुछ अपने अनुभव अवश्य कहना चाहूंगा । 
            मैं महाराष्ट्र के वेरुल में था, वहां एक ब्राह्मण देवता अपनी काशी की पढ़ाई की प्रशंसा में बताया कि वहां हिन्दुस्तानियों को नहीं पढ़ाया जाता था, उन्हें मैंने पढ़ाना शुरू किया था । मैंने पूछा कि आप हिन्दुस्तानी नहीं हो ? उन्होंने कहा हिन्दुस्तान तो मात्र उत्तर प्रदेश ही है शेष नहीं । अब आप उन ब्राह्मण देवता से कितना सहमत हैं ? यह एक ब्राह्मण से नहीं कई लोगों से सुना है । आप कितना हिन्दुस्तान मानते हो विचार करो बिना किसी टकराव के ।
                जब मैं आळंदी में था तब किसी ने कहा कि हिन्दी कोई भाषा ही नहीं है क्योंकि हिन्दी की अपनी कोई लिपि ही नहीं है । देवनागरी तो मराठी लिपि है । चलो मान लिया लेकिन नेपाली भाषा भी देवनागरी में है और सुना है कि भूटानी भी देवनागरी है फिर क्या वह भी भाषा नहीं हुई ? भाषा होना अलग बात है और लिपि होना अलग बात है ।
                अब आते हैं हिन्दी पर तो हिन्दी कितनी पुरानी भाषा है जानते हैं ? हिन्दी से भी पहले ब्राह्मी भाषा थी, क्या किसी को पता है कि ब्राह्मी भाषा कहां गई ? हिन्दी जिसे हम कहते हैं उसमें भी ब्रजभाषा,अवधी, मैथिली सहित कितनी, भाषाएं हैं ? किसी को कुछ पता है ? हमने तो एक बार समाचारों में पढ़ा था कि मारवाड़ियों का विकास तब तक नहीं हो सकता है जब तक उनकी स्वतंत्र लिपि न हो, अभी देवनागरी लिपि से काम चला रहे हैं और मारवाड़ी लिपि लिखने का प्रयत्न किया जा रहा है,सच चाहे जो हो । इसी प्रकार प्रत्येक भाषा में व्यवस्था है । किन्तु प्रत्येक भाषा को वहां की साहित्यिकी भाषा ने जोड़कर रखा है । 
                किन्तु उसमें भी बहुत अधिक उर्दू का घोलमेल है, यहां तक हमारे धर्म ग्रंथ रामचरितमानस में भी उर्दू,अरबी शब्द खूब मिल जायेंगे । हमने मराठी में उर्दू का बोलबाला हिन्दी से भी अधिक देखा है । तथापि कुछ लोग हिन्दू होकर हिन्दी भाषा की दुहाई देते हैं और उन्हें हिन्दू विरोधी मानकर उनका उपहास करते हैं । मेरे बचपन में तो ५०% से अधिक हिन्दी में उर्दू का घोलमेल था जो आज काफी सुधार हुआ है और आगे भी होगा । लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हिन्दी न बोलने वाला हिन्दू नहीं है ? क्या मुस्लिम राष्ट्रों में रहने वाले हिन्दू हिन्दू नहीं हैं ? क्योंकि वहां की भाषा या तो उर्दू है या अरबी है अथवा अन्य देशों की फ्रेंच आदि । भारत में, तमिल, तेलगु, मलयालम आसामिया, बंगाली आदि बोलने वाले हिन्दू नहीं हैं ? यदि हैं तो स्वभाव से ही मिली हुई भाषा को लेकर कटाक्ष उपहास करते हुए उर्दू पर ही हमला क्यों ? क्या आप में सामर्थ्य है उर्दू को विभिन्न भाषाओं से अलग करने का ? व्यर्थ भाषा को धार्मिक रूप देकर हरे आतंकवाद की तरह भगवा आतंक क्यों फैलाना चाहते हैं ? 
             इतिहास देखो अगर उर्दू मात्र मुसलमानों की भाषा होती तो पश्चिमी (वर्तमान) पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) पर उर्दू यह कहकर थोपने की कोशिश की थी कि बंग्ला भाषा हिन्दुओं की थाती है वह हर हाल में हटानी होगी और उर्दू अपनानी होगी लेकिन पूर्वी पाकिस्तान नहीं माना और भाषा को लेकर ही युद्ध हुआ और बांग्लादेश बन गया और वहां की राष्ट्रीय भाषा बंग्ला है । अतः भाषाई जहर मत घोलो ।
             अब दूसरी बात यह है कि क्या आप हिन्दू हो ? अगर हिन्दू हो तो फिर वेद आपका संविधान एवं प्रमाण कैसे हो सकता है ? क्योंकि यदि संविधान में में जिस धर्म का वर्णन न हो वह धर्म कैसे हो सकता है ? वेद और पुराण जहां तक मैं पहुंच सका हूं वहां तक न तो हिन्दू का वर्णन मिलता है और हिन्दुस्तान का । जितनी परिभाषाएं गढ़ी गई हैं वे सब बाद की और मनगढ़ंत मात्र हैं । वेद और पुराण आर्यों का वर्णन करते हैं, इसलिए हम कल आर्य थे आज आर्य हूं कल रहूंगा । न मैं हिन्दू था न हूं न होऊंगा और हो सकता भी नहीं । लेकिन...., लेकिन यहां गड़बड़ हो गई । अगर अपना अस्तित्व बचाना है और इस्लामिक आतंकवाद से रक्षा करनी है, ईसाई आदि धर्मांतरण को रोकना है तो हमें संगठित होना ही पड़ेगा, अन्यथा मैं आर्य हो गया, आप द्रविड़ हो गये, तो कोई शक,हूण, आन्ध्र, पुलिन्द आदि हो जायेगा और इस फूट का परिणाम होगा कि हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा । ये मुसलमान कुछ प्रतिशत छोड़कर किसी के सगे नहीं हुए हैं और हो सकते भी नहीं । अतः उस संगठन के लिए आर्य द्रविड़ आदि भावों को छोड़कर एकमात्र हिन्दू नाम से संगठित होना चाहिए, इसमें जो अपने को हिन्दू नहीं मानते हैं वे आदिवासी और दलित आदि को भी संगठित होना पड़ेगा अन्यथा अस्तित्व इनका लोगों का भी समाप्त हो जायेगा । एकमात्र हिन्दुत्व का ध्वज ही ऐसा ध्वज है जो सभी को संगठित कर सकता है । 
               अब बात करते हैं ध्वज की । मैं देख रहा हूं कि कुछ लोग तिरंगा झंडा का भगवा झंडे को लेकर अपमान कर रहे हैं । १३ अगस्त से १५ अगस्त २०२२ ई. चलने वाले आजादी के अमृत महोत्सव में तिरंगा झंडा न लगाने और भगवा लहराने का फरमान जारी कर रहे हैं । लेकिन क्या यह मात्र तिरंगा का ही अपमान है ? अथवा पूरे राष्ट्र का ? क्योंकि सुरक्षित राष्ट्रध्वज ही सुरक्षित राष्ट्र की पहचान है । जो लोग भगवा ध्वज की वकालत करते हैं, उन्हें महाभारत अवश्य पढ़ना चाहिए, जहां सभी की ध्वजाओं और वस्त्रों के अलग अलग रंग एवं पहनावे का वर्णन किया गया है । इस प्रकार हम चारों ओर विचार करने पर भी एक ध्वज निश्चित नहीं कर पायेंगे और कलह का आतंक आपस में ही शुरू होकर विनाश हो जायेगा,जैसा कि पहले भी राजाओं में होता था और विनाश को प्राप्त हुए ।
            इसलिए जैसे हम आर्य द्रविड़ आदि होकर भी एक हिन्दुत्व को आधार मानकर संगठित होकर यह भी भूल गये हैं कि हम आर्य आदि हैं, वैसे ही अपने अपने क्षेत्र में अपनी अपनी ध्वजाएं बुलंद रखो लेकिन एक राष्ट्र की एक ही ध्वजा के नीचे सबको संगठित होना आवश्यक है, वह आज के समय में तिरंगा ध्वज से अधिक सुरक्षित और कोई स्थान संगठित होने के लिए नहीं हो सकता है । अतः राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता पूर्ति के लिए तिरंगा और उसके साथ देश का अपमान न करें । यह कार्य तो शरिया कानून वाले हरे आतंकी तो कर ही रहे हैं किन्तु आप भगवा आतंकी न बनकर संगठित होकर जिस किसी भी उपाय से अपनी और सामाजिक रक्षा करें और अपने धर्म एवं संस्कृति को बचाएं । ओ३म् !
                               स्वामी शिवाश्रम 

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