ज्ञान प्राप्ति का साधन
ज्ञान प्राप्ति का साधन
--------------------------
गीता २/४५ से लेकर इस २/५१वें श्लोक तक मानव जीवन के परम लक्ष्य परमार्थतत्त्व को निर्धारित करते हुए “त्रैगुण्यविषया वेदा” द्वारा सकाम कर्मों के अशेष त्यागपूर्वक “निस्त्रैगुण्यो भवः” द्वारा तीनो गुणों से ऊपर उठकर वेदान्त तत्त्व का आश्रय लेकर निर्द्वन्द्व, नित्य स्व-स्वरूप में स्थित बिना किसी योगक्षेम के आत्मभाव में स्थिर होने के लिए कहा गया है ।
अब आत्मभाव में स्थिर होने और और सकाम कर्मों के त्याग के लिए क्यों कहा गया है ? इस पर कहते हैं कि कर्मों से प्राप्त पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी फलभोग गढ्ढे और ताल-तलैया के बरसाती पानी के समान क्षणिक हैं जबकि आत्मभाव समुद्र के जल के समान स्थिर एवं नित्य एकरस है, अतः विवेकशील को कर्मकांड में न फंसकर आत्मस्वरूप में ही स्थिर होना चाहिए ।
किन्तु कर्मशील स्वभाव वाले जीव के लिए कर्म त्याग सहज नहीं है क्योंकि कर्म ही उसका स्वभाव है और कर्म से ही शरीर प्राप्त है अतः वह बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता है, इसके लिए पहले कर्म का स्वरूप और फिर योग का स्वरूप बताते हुए कर्म को कर्मयोग बना देने की बात कही है । बुद्धि जब योग (समता) में स्थिर हो जाये तो दीनता के कारणभूत सकाम कर्मों के फल की और कर्म एवं कर्तृत्वकाभाव का भी त्याग कर दे और योग का ही अनुष्ठान करे क्योंकि संपूर्ण कर्मों का फल ही है योग अर्थात समता की प्राप्ति । यही समत्वयोग ही दूसरे शब्दों में ज्ञानयोग की भूमिका है जहाँ संपूर्ण शुभाशुभ कर्मों का नाश हो जाता है २/५० और ऐसा मनीषी ही जन्मादि बन्धनों से भलीभाँति मुक्त होकर अनामय (निर्विकार) पद मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । इसी बात को भगवान आगे कहते हैं—
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥४/३२॥
अर्थात जितने भी यज्ञों का वर्णन वेदों (मन्त्रभाग) में किया गया है वे सभी कर्म से ही उत्पन्न हुए हैं यह जान लो अर्थात कर्म से प्राप्त समस्त ब्रह्मलोक पर्यन्त ऐश्वर्य नाशवान हैं, अतः उन सकाम कर्मों का त्याग करके (ज्ञान प्राप्ति के साधनभूत) कर्मयोग का अनुष्ठान करके मोक्ष को प्राप्त करले क्योंकि “सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते २/३३ संपूर्ण शुभाशुभ कर्मों की समाप्ति स्वरूप ज्ञान (स्वरूपस्थ होने) से ही होती है ।
इस प्रकार जब समत्वयोग में स्थित होकर कर्म का अनुष्ठान करते करते जिस समय भी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जायेगी उसी समय ब्रह्मलोक पर्यन्त वर्तमान में सुने गये और भविष्य में सुने जाने वाले सभी भोगों की ओर से निर्वेद अर्थात अशेष वैराग्य प्राप्त हो जायेगा और बहुत वेद-शास्त्रों के पढ़ने और सुनने से भ्रमित हुई बुद्धि स्व-स्वरूप में समाधिस्थ होकर समता अर्थात ब्रह्म के तादात्म्य को प्राप्त होकर हमेशा हमेशा के लिए त्रिविध तापों से मुक्त हो जायेगा । ओ३म् !
—स्वामी शिवाश्रम
टिप्पणियाँ