भक्तियोग का अद्वैत सिद्धांत एवं तत्त्व निश्चय
भक्तियोग का अद्वैत सिद्धांत
आगे भगवान कहते हैं कि जो कुछ भी इस जगत में दिखाई दे रहा है वह मुझसे भिन्न अणु मात्र भी नहीं है, क्योंकि दिखाई देने वाला जगत मुझमें वैसे ही स्थित है जैसे धागे में पिरोई हुई धागे की मणियां, अर्थात धागे की मणियों में धागे (या रुई) के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है और धागा तो धागा है ही । वैसे ही संपूर्ण जगत रूप नाना प्रकार की मणियां हैं और मैं धागा रूप हूं जिसमें ये मणियां (जगत) पिरोई (स्थित) हैं ।
अब भक्तियोग में विचारणीय तथ्य यह है कि संपूर्ण जगत भी भगवान ही है और जिसमें यह जगत स्थित है वह भी भगवान ही है । अर्थात बाहर भीतर ऊपर नीचे मध्य, दिशा विदिशा इत्यादि में जो कुछ भी है वह भगवान ही है,स्वयं मैं भी । सब स्वयं भगवान है परन्तु किस प्रकार ? उसकी अनुभूति क्यों नहीं होती है ? इस पर भगवान आगे उदाहरण सहित बताते हैं……
परन्तु इतना अवश्य समझ कर रखना चाहिए कि भक्तियोग में ठोस अद्वैत सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है जबकि सांख्य योग में ठोस द्वैत सिद्धांत । इसीलिए भगवान सातवें अध्याय में दोनो ही प्रकृतियों को जगत की उत्पत्ति में हेतु तो माना है किन्तु उन दोनों का ही निमित्तोपादान कारण स्वयं को बताकर एकमात्र परमसत्ता का प्रतिपादन करते हुए स्वयं से भिन्न सबका निषेध धागे और धागे की मणियों के माध्यम से कर दिया है, परन्तु सांख्य योग अध्याय तेरह में यह नहीं कहते हैं कि सब कुछ मैं हूं बल्कि कहते हैं सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मैं हूं । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को भिन्न भिन्न प्रतिपादन करके द्वैत सिद्धांत को स्पष्ट किया । इतना ही नहीं १३/२६ में प्रकृति पुरुष (जीवात्मा) से संपूर्ण सृष्टि को तो माना है किन्तु उस उनका भी कोई निमित्तोपादान कारण न कहकर द्वैतभाव को ही पुनः स्पष्ट किया है ।
मूर्ति पूजा का लक्ष्य
इतना ही नहीं सातवें अध्याय में अद्वैत सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए भक्तियोगी के मन को स्थिर आधार भी दिया गया है वासुदेवः सर्वम् । सब कुछ वासुदेव ही है तब मन को टिकाने के लिए किसी आधार को ढूंढने की आवश्यकता नहीं है । जिस चीज में मन टिक जाये उसी में वासुदेव को लक्ष्य करके मन को टिकाया जा सकता है, क्योंकि मणि यदि पत्थर, मिट्टी, कागज, गोबर, वृक्ष इत्यादि की मूर्तियां हैं तो उसमें लक्ष्य किया जाने वाला धागा तो परमात्मा ही है । अतः धागा यानी परमात्मा का लक्ष्य स्थिर रखकर खूब मूर्ति पूजन करो कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु ध्यान रहे वासुदेवः सर्वम् का, क्योंकि मूर्ति पूजा करते करते मूर्ति ही लक्ष्य न बन जाये अन्यथा अनर्थ हो जायेगा ।
परन्तु सांख्य योग में मन को टिकाने का आधार क्या है ? तब कहते हैं कि उसे न तो सत कह सकते हो और न ही असत जो न सत हो और न असत तो मन को कहां टिकाओगे ? यही स्थिति मनुष्य के पतन का कारण होगी है, क्योंकि यह निर्विशेष तत्त्व है । यही परम तत्त्व संपूर्ण ब्रह्मांड को व्याप्त करके निर्लिप्त भाव से स्थित है । इसी की महिमा से सभी महिमावान हैं । परन्तु यह स्थिति मन वाणी से परे (अतीन्द्रिय) है। हम जब भी उसे पकड़ना चाहेंगे तब मन वाणी से ही पकड़ेंगे, क्योंकि इसके अतिरिक्त हमारे पास अन्य कोई यन्त्र ही नहीं है उसे पकड़ने का । अतः प्रकृति के गुण रूप इन्द्रियों द्वारा ही उस परमात्मा को उसके गुणों के सहित पकड़कर ही निर्विशेष का अनुभव कर सकते हैं । उसके गुण क्या हैं ? इस कहते हैं उसकी व्यापकता ही उसका गुण है, इसी एक गुण के आश्रित होकर ही उस इन्द्रियातीत को इन्द्रियों से सत्तात्मक रूप से अनुभव करके फिर उसके निर्विशेष परम अद्वैत स्वरूप में स्थित हुआ जा सकता है ।
इस प्रकार जिसका इन्द्रियों के बिना न तो अनुभव हो सकता है और न ही जाना जा सकता है ऐसे परम तत्त्व के भ्रम में न पड़कर पहले ही उसके सगुण स्वरूप वासुदेवः सर्वम् के रूप में मन को स्थिर करके परम अद्वैत तत्त्व में प्रतिष्ठा पा लेनी चाहिए । जिसका वर्णन भगवान आगे इस प्रकार करते हैं……।
सगुण अनुभूति का स्वरूप
जल में रस मैं हूं, सूर्य और चन्द्र की आनन्ददायक प्रभा हूं, संपूर्ण वेदों में प्रणव अर्थात ॐ, आकाश में शब्द तथा पुरुषार्थी मनुष का पौरुष अर्थात पुरुषार्थ, पृथ्वी की पुण्यमयी (पवित्र) गंध, अग्नि का तेज अर्थात दाहिका शक्ति, संपूर्ण प्राणियों का जीवन, और तपस्वियों का तप, संपूर्ण चराचर प्राणियों का सनातन बीज मुझ सर्वात्मा को ही जान । इतना ही नहीं (सात्त्विक) बुद्धि वालों की बुद्धि और तेजस्वी (यशस्वी) पुरुषों का तेज मैं सर्वात्मा ही हूँ । जिनमें किसी भी प्रकार की कामना नहीं है, राग अर्थात आसक्ति नहीं है ऐसे स्वभाव से ही दूसरों (साधु पुरुषों) को दुष्टात्माओं से संरक्षित करने वाले बलवानों का बल, तथा जो धर्म (मर्यादा) को बाधित (नाश) न करे ऐसा सन्तानोपत्ति का हेतु काम मैं ही हूँ ।
इन चार श्लोकों में जल का रस, आकाश का शब्द, पृथ्वी की गंध अग्नि का तेज से रूप नामक तन्मात्राओं को ही समझना चाहिए, कारण कि पृथ्वी में पुण्यमयी (पवित्र)गंध का वर्णन किया गया है । गंध सदैव निमित्त ही होती है, किसी न किसी वस्तु विशेष के अश्रित । अतः वह पवित्र एवं स्थिर कदापि नहीं हो सकती है, परन्तु तन्मात्रा सदैव स्थिर एवं एकरस होती है और जो एकरस हो वही पुण्यमय अर्थात पवित्रता प्रदान कर सकती है, इस आधार पर पृथ्वी की गंध रूप से तन्मात्रा कही गई है । इसी आधार पर अग्नि का तेज रूप नामक, रस और शब्द भी तन्मात्रा ही स्वयं सिद्ध हैं । परन्तु यहां स्पर्श नामक तन्मात्रा का वायु रूप वर्णन नहीं हुआ है उसका अध्याहार स्वयं कर लेना चाहिए ।
अब परमात्मा जगत से अभिन्न कैसे हैं धागे में धागे की मणियों की तरह ? इसको समझते हैं ……
जल मणि है और उसकी तन्मात्रा रस धागा है, बिना रस के जल और जल के बिना रस संभव ही नहीं है, परन्तु रस का अनुभव करना है तो स्थूल जल को ग्रहण करना ही पड़ेगा, रस का अनुभव स्वतः हो जायेगा । हम कभी खट्टी चीजें देखते हैं या किसी को खाते देखते हैं तो मन में उस वस्तु के रसास्वादन की अनुभूति होती है, ऐसी अनुभूति होते ही मुख में पानी आ जाता है और वैसा है खट्टा रस मुंह में भर जाता है । इसी प्रकार सूर्य चन्द्र रूप मणियों का धागा उनकी प्रभा है । आगे की सभी विभूतियों का इसी प्रकार अध्याहार कर लेना चाहिए और तब समझ में आयेगा कि मणि अर्थात स्थूल मूर्त रूप से भिन्न उसको उस रूप में महिमा मंडित करने वाला रस अदि गुण भिन्न नहीं है और गुण से भिन्न वह मणि रूप वस्तु नहीं है, क्योंकि जहां कहीं गुण दिखेगा वह प्राकट्य किसी न किसी रूप में ही होगा यह गुण सहित कल्पित रूप ही सगुण साकार कहा जाता है । जहां कहीं रूप होगा गुण उससे भिन्न हो ही नहीं सकता है कोई न कोई गुण अवश्य होगा अर्थात गुण गुणी से भिन्न नहीं हो सकता है ।
निर्विशेषतत्त्व की अनुभूति का साधन
इस प्रकार गीता में सगुण साकार की उपासना या अनुभूति के स्वरूप का विवेचन उदाहरण सहित पांच श्लोकों में भगवान ने किया, जिसे तदानुसार तादात्म्य भाव से अनुभव करते ही शेष सगुण निराकार और निर्गुण-निराकार की अनुभूति स्वतः हो जायेगी । परन्तु निर्गुण निराकार की अनुभूति करने के लिए सगुण साकार से ऊपर उठकर सगुण निराकार में स्थित होना अति आवश्यक है जिसका विवेचन इस प्रकार करते हैं……
जितने भी सात्त्विक भाव हैं और राजस तथा तामस भाव भी हैं उन सबको मुझसे जान, परन्तु न मैं उनमें हूँ और न वे मुझमें हैं । तात्पर्य यह है कि जो भी मणि और धागे के रूप त्रिगुणात्मक जगत है वह मुझसे अर्थात मेरी सत्ता से ही मात्र सत्तावान हो रहे हैं, यह परमात्मा का गुण हो गया कि सब उसी की सत्ता से सत्तावान हो रहे हैं यह सत्ता व्यापक गुण वाली है, अतः यह स्वरूप सगुण हो गया, उसकी व्यापकता सार्वभौम है परन्तु एक कोई स्वरूप न होने से निराकार हो गया, इस प्रकार यह स्वरूप सगुण निराकार हो गया, परन्तु वह त्रिगुणात्मक जगत न परमात्मा में है और न परमात्मा उनमें है यह परमात्मा का निषेधात्मक इन्द्रियातीत निर्गुण निराकार निर्विशेष त्रिगुणातीत स्वरूप हो गया ।
परन्तु अभी भी इतने विवेचन के बाद भी उसकी अनुभूति क्यों नहीं हुई ? इस पर कहते हैं कि यह संपूर्ण जगत तीनों गुणों के भाव (सत्ता) से युक्त है । अर्थात संपूर्ण जगत में केवल गुणों की सत्ता है, गुण नहीं तो जगत नहीं । यह बात तो ठीक है परन्तु इन्हीं (इन्द्रिय रूप) गुणों द्वारा ही उसे जाना जा सकता है फिर भी नहीं जान पाने का कारण यह है कि वह इन गुणों (इन्द्रिय भोगों) से मोहित हो जाता है । पद चाहिए, यश चाहिए, विद्वान बनना है इत्यादि इन्द्रिय भोगों से तृप्त ही नहीं होता है, इसी मोह के कारण ही जो इन्द्रिय रूप गुण उसे मुझ परम अक्षय (अविनाशी) परमात्मा को जानने के लिए मिले हैं उसका दूसरी ओर विनियोग कर देने के कारण नहीं जाना पाता है । यही गुण रूप माया मुझ परम देव से संबंधित होने के कारण जो मात्र गुणों पर केंद्रित हो जाता है उसके लिए वह मुझे अपने आवरण में ढक लेती है जो अत्यंत दुर्लंघ्य हैं, उसके पार मुझ सर्वात्मा निर्विशेष परमतत्त्व को देख पाना या अनुभव कर पाना संभव नहीं है । परन्तु यदि मुझे देखना ही चाहता है तो एकमात्र मेरे साकार एवं सगुण स्वरूप का ही अश्रय ले, मुझे ही सर्वत्र देखे तो फिर उन गुण रूपी दुर्लंघ्य माया को निश्चित ही पार कर जायेगा अर्थात मुझ अनिर्वाच्य पद को प्राप्त (अनुभव) कर ही लेगा । ओ३म् !
स्वामी शिवाश्रम
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