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कर्म का स्वरूप

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कर्म की परिभाषा भगवान स्वयं देते हैं— “यज्ञार्थाकर्मणः” ३/९ अर्थात कर्म वह है जो ईश्वर के निमित्त किया जाये, क्योंकि वह मोक्ष का हेतु है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि जिन क्रियाओं द्वारा मोक्ष की प्राप्ति हो उस क्रियामात्र को कर्म नाम से परिभाषित किया गया है, इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए स्वयं श्रीभगवान् कहते हैं— “भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्म सञ्ज्ञितः” ८/३, अर्थात प्राणियों की उन्नति का जो श्रोत त्याग है वही कर्म नाम से कहा गया है । गीता के अनुसार प्राणियों की उन्नति मोक्ष में ही मानी गई, अन्य सांसारिक उन्नति उन्नति नहीं बल्कि पतन है ।               इससे यह तो स्पष्ट हो गया है कि निरपेक्ष एवं कर्तृवाभिमान से रहित होकर की जाने वाली क्रिया मात्र कर्म ही है (निरपेक्ष कर्तृवाभिमान को समझने के लिए #गीता_में_सहजावस्था नामक शीर्षक पढ़ना चाहिए) । यही बात न्याय प्रस्थान (ब्रह्मसूत्र) में पुरुषार्थ रूप से परिभाषित की गई है, इससे भिन्न अन्य कोई पुरुषार्थ है ही नहीं ।         ...

आत्मौपम्येन सर्वत्र

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आत्मौपम्येन सर्वत्र          मित्रों ! मैं ऐसा कुछ लिखना नहीं चाहता था किन्तु कुछ वामपंथी दुराचारी अपनी वासना की ओट भगवान श्रीकृष्ण और गोपिकाओं के उदाहरण से पूर्ति करना चाहते हैं, अतः मैं शिक्षा की दृष्टि से कई घटनाओं में से आपको अपने जीवन की मात्र दो घटनाएं बताऊंगा जिसे गीता के #आत्मौपम्येन_सर्वत्र के रूप में समझा जा सकता है—                एक घटना सन् १९९७ ई. की है जब मैं नर्मदा परिक्रमा में था, उस समय मैं गुजरात के अंकलेश्वर में रामघाट नामक तीर्थ में स्नान कर रहा था, एक पंडा आकर बोला— अरे क्या साधू बन गये, विवाह करते घर में रहते पत्नी के साथ ऐश करते । मैने ककहा— हाँ पण्डा जी, मैं भी यही चाहता था किन्तु घर वालों ने बहुत कहने पर भी मेरा विवाह ही नहीं किया तो साधू बन गया, आज भी अगर विवाह हो जाये तो घर चला जाऊँगा, आप अपनी #बेटी का ब्याह मेरे साथ कर दो तो घर चला जाऊँ, वह बिगड़ गया और बोला मैं अपनी बेटी क्यों ब्याह दूँ, तो मैने कहा— जिस किसी लड़की से ब्याह होगा तो वह भी तो किसी न किसी की बेटी ही होगी, किन्तु अन्य ...

गीता में सहजावस्था

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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥2–47॥ भावार्थ : तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो॥47॥          विचार— कर्मण्येवाधिकारस्ते द्वारा मनुष्य के कर्तव्य का बोध कराया गया है, कारण कि कर्तव्य बोध ही नवजात बच्चे की तरह निष्कपट और निश्छल एवं सहज होता है, किन्तु जिस समय कर्तव्य बुद्धि होने पर भी किये गये कर्म में फलाकांक्षा हो जाती उस समय स्वार्थ सामने उपस्थित हो जाता है जिससे कर्तव्य बोध ढक जाता है फलस्वरूप छल, कपट आदि संपूर्ण विकारों के आवरण मनुष्य को ढ़क लेते हैं और उसके द्वारा किये जाने वाले सभी कर्म अकर्तव्य अर्थात निषिद्ध कर्म की ओर अग्रसर हो जाते हैं । इसी अकर्तव्य पर अंकुश लगाने के लिए ही कहते “मा फलेषु कदाचन” कृत कर्म से क्या फल सिद्धि होगी इस पर विचार भी करने का तेरा अधिकार नहीं है फल प्राप्ति के लिए सोचना तो दूर की बात है ।             अब बात आती है कि चलो हम बिना कर्...

प्रज्ञानं ब्रह्म

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प्रज्ञानं ब्रह्म              (यू ट्यूब पर चलाये जा रहे आध्यात्मिक तथाकथित आचार्यों वेदान्तियों और सिद्धांतियों द्वारा चलाये जा रहे भ्रमक दुष्प्रचार के शिकार होने से बचें ।)              #आपका_कथन_है कि जो कहते हैं कि मैं स्त्री का स्पर्श नहीं करता वह पाखंडी है, जब सब कुछ ब्रह्म है तो स्त्री ब्रह्म क्यों नहीं ? आप स्त्री का तिरस्कार करके ब्रह्म का खंडन करते हैं । तो इस पर मैं इतना कहूँगा कि ब्रह्म गाजर मूली जितना कमजोर नहीं है जो इस प्रकार खंडित हो जायेगा, आप तो वेदान्ती हो उस पर भी वीतरागी संन्यासी, तो क्या आपने “प्रज्ञानं ब्रह्म” पढ़ा ? “आत्मौपम्येन सर्वत्र” पढ़ा ? नहीं पढ़ा तो पढ़िए, तथापि कुछ विचार दे रहा हूँ, बुद्धिमान क्षमा करेंगे, जो मूर्ख होंगे उनसे मूर्खता के अतिरिक्त और कोई भी अपेक्षा नहीं करता हूँ ।             #व्यष्टि_रूप_मैं—           ...

गीता का साधन साध्य एवं अधिकारी

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गीता का साधन साध्य एवं अधिकारी श्रीभगवान ने गी.२/४५ में वैदिक कर्म (स्वर्गादि कामना वाले कर्मकांड) का त्याग करके आत्मभाव में स्थित होने को बताया है, जिसका पहला साधन है निर्द्वन्द्व होना । द्वन्द्व शब्द द्वैत का प्रर्यायवाची शब्द है, निर्द्वन्द्व होने पर ही “नित्य सत्त्वस्थ और निर्योगक्षेम" संभव हो सकेगा, उसी के लिए कर्म और योग को परिभाषित किया २/४७-४८। इसके बाद कहते हैं— दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।  बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥२/४९॥  इस श्लोक में अधिकांश अद्वैताचार्यों ने "बुद्धौ शरणमन्विच्छ" का अर्थ ज्ञानयोग की शरण लेना बताया है, किन्तु यह बात समझ में नहीं आती है क्योंकि अगले ही चरण में कहते हैं— “कृपणाः फलहेतवः” अर्थात सभी सकाम कर्म दीनता (जन्म-मरण) का हेतु हैं, इसका अर्थ यह हुआ कि “बुद्धौ शरणमन्विच्छ” का अर्थ ‘‘ज्ञानयोग” अद्वैताचार्यों का गलत है ? तो मैं कहूँगा कि नहीं, क्योंकि जिस प्रकार अध्याय १३ में ज्ञान प्राप्ति के साधन को ही वहाँ ज्ञान कहा गया है उसी प्रकार यहाँ भी निष्काम कर्मयोग को ही यहाँ ज्ञानयोग (समत्व भाव) की प्राप्ति के साधन ...

सगुण उपासना

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सगुण उपासना - ------------------ सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥             हे कौन्तेय ! सहज कर्म दोषयुक्त दिखने पर भी नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि सभी सकाम कर्म धुंवे से अग्नि के समान ढके हुए हैं ।            पहले कहा था ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः ३/३५, ऐसा कहने का कारण यहाँ— सर्वारम्भा हि दोषेण, सभी सकाम कर्मों का आरम्भ जितना गुणयुक्त रमणीय दिखता है उससे अधिक उस कर्म के विज्ञान के अभाव में ठीक वैसे ही भयाकारी क्लेश भी हैं, जैसे ईंधन के अधिक गीला होने पर अग्नि तो ठीक से जलती नहीं है किन्तु धुंवा आंखों को अत्यन्त पीड़ित करता है, इसीलिये कहा था— परधर्मो भयावहः ३/३५, हम जब भी दूसरे के धर्म या कर्तव्य को अपनायेंगे उस समय कोई न कोई कामना ही हमें उस ओर खींचती है जिस कारण से हमें भय उपस्थित हो जाता है किन्तु हमारे सहज और परंपरागत प्रप्त कर्म जिनका मात्र परंपरा निर्वाह से अतिरिक्त और कोई प्रयोजन ही नहीं है ऐसे स्वभाव से ही प्राप्त...

तुलना क्यों ?

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तुलना क्यों ? मैं विभिन्न समूहों आदि में देखता हूँ कि साधना आदि के क्रम में या सामाजिक व्यवस्था को लेकर वे चाहे साधु-संत हों या गृहस्थ, स्त्री शब्द का प्रयोग करते ही उसके लक्ष्य को बिना समझे समानता के अधिकार और स्त्री के अपमान का आरोप लगाकर पता नहीं किन किन उपाधियों से अलंकृत किया जाता है ।         ठीक है मैं कभी भी न तो स्त्री विरोधी हूँ और न ही निंदा का कोई प्रयोजन रखता हूँ, तथापि मैं आपसे प्रश्न करना चाहूंगा कि समानता का अधिकार शरीर को लेकर करना चाहिए या व्यवहार को लेकर ? यदि शरीर को लेकर समानता की बात करते हैं तो यह युक्तिसंगत नहीं हो सकता है क्योंकि शारीरिक रचना जन्मजात भेदभाव से युक्त यहाँ तक कि स्त्री-पुरुष की आवाज तक में प्राकृतिक भेद है जिसे कोई भी मिटाने में सक्षम नहीं है । अब यदि व्यवहार को लेकर समानता की जाये तो यह भी युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि एक ही स्त्री पति के साथ कुछ अन्य व्यवहार करती है पुत्रादि के साथ कुछ और, यह भी प्राकृतिक ही है, अतः शरीर और व्यवहार दोनो ही दृष्टि से प्रकृति का उल्लंघन करके समानता का व्यवहार युक्ति सं...