परमेश्वर का स्वरूप
परमेश्वर का स्वरूप
नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्च न मध्यं परिजग्रभत् ।
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्याशः ॥श्वेता.उ..अ.४/१९॥
परमेश्वर का स्वरूप क्या है ? निर्गुण-निराकार ? या सगुण-साकार ? द्वैत या अद्वैत ? हमने बहुत विचार किया इस विषय पर । हम अगर श्रुति का आश्रय लें तो श्रुति कहती है कि वह परमेश्वरतत्त्व न ऊपर-नीचे, न आड़ा-तिरछा, और न मध्य में ही उसे ग्रहण किया जा सकता है, जिसका कारण बताया कि ग्रहण उसे किया जा सकता है जिसका कोई एक स्वरूप निश्चय हो और स्वरूप से भिन्न हो । जो एकदेशीय हो । जब संपूर्ण ब्रह्मांड उसी एक तत्त्व से व्याप्त हो रहा है तो वह ऊपर-नीचे आदि कैसे कहना बनेगा ? बर्फ के टुकड़े में बर्फ किस भाग में है, यह कहना बनेगा कैसे ? क्योंकि वह संपूर्ण टुकड़ा ही बर्फ है । इसी प्रकार परमेश्वर तत्त्व भी सर्वरूप है अतः वह किस रूप वाला है यह कहना ही नहीं बनता है, अतः उसे किसी एकदेशीय उपमा से उसके महान प्रभाव को ग्रहण नहीं किया जा सकता है । इसी को अर्जुन भी कहते हैं—। न त्वत्समोऽत्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ११/४३ ।
इस प्रकार विचार करने पर यह तो सिद्ध हो जाता है कि उसका कोई रूप नहीं है अर्थात वह निराकार है, अतः उसकी कोई प्रतिमा नहीं हो, हो सकती है । यहां पर कुछ विकृत मानसिकता वाले लोग प्रतिमा का अर्थ आगे पीछे के अर्थ पर विचार न करके पत्थर आदि की मूर्ति करते हैं, चलो हमने आपकी बात मान भी लिया कि प्रतिमा का अर्थ पत्थर आदि की मूर्ति ही होता है और वह मूर्ति रूप हो नहीं सकता, तो अब प्रश्न उठता है कि क्या वह निर्गुण-निराकार है ? आप कहोगे हां….। तो अब मेरा प्रश्न आप से पूछना बनता है कि फिर आपने उस निराकार को किस रूप में जाना ? ॐ के रूप में ? तो यह ॐ क्या है ? देवनागरी लिपि वाला ? बंगला, तेलगू, तमिल, अंग्रेजी या अन्य लिपि वाला ? इस ओंकार को किस रूप में ग्रहण किया ? जब आप ध्यान करते हो तो आप लिपि का ध्यान करते हो और वह लिपि तो परमेश्वर तत्त्व हो नहीं सकता, क्योंकि आप का परमेश्वर तत्त्व तो निराकार है, अनुपमेय है, फिर आप किसी लिपि से उसकी तुलना कैसे कर सकते हैं ? यदि आप कहो कि उस लिपि में सन्निहित परमेश्वर तत्त्व के लक्ष्य पर ॐ के आश्रम मन को केंद्रित करता हूं, तो भाई ! जैसे आप ॐ नाम की लिपि के आश्रित परमतत्त्व पर मन को केंद्रित करते हो, वैसे ही अन्य कागज, मिट्टी, पत्थर आदि की प्रतिमा में उसी प्रतिमा और मंत्र का आश्रय लेकर उसके लक्ष्य परमेश्वर तत्त्व पर ही अपने आपको केंद्रित करता है । अतः यदि उसका प्रतिमा आदि पूजन गलत या ढोंग है तो आप का किसी लिपि पर ध्यान केंद्रित करना भी ढोंग ही है ।
कुछ लोग प्रतिमा पूजन तो ढोंग बताते हैं किन्तु मोमबत्ती, घृतदीप आदि कि आश्रय लेकर उसका ध्यान करते हैं ? तो भाई आप मोमबत्ती या दीपक के प्रकाश का ध्यान कर रहे हो या उसके लक्ष्य प्रकाशस्वरूप परमेश्वर तत्त्व का ? क्या ये मोमबत्ती प्रतिमा नहीं है ? दीपज्योति प्रतिमा नहीं है ? फिर आप किसी अन्य को मूर्तिपूजक कहकर गाली कैसे दे सकते हो ? विचार करो कि यह गाली तो लौटकर आपकी ही मेहमानी कर रही है । इसी प्रकार कुछ लोग ईश्वर को निराकार मानते हैं, इसलिए यज्ञशाला में, सप्तमात्रिका, षोडषमात्रिका, नवग्रह, सर्वतो-लिंगतोभद्र आदि को स्थान नहीं देते हैं । तो भाई आपका ईश्वर तो निराकर है, फिर आपके द्वारा अग्नि में डालकर नाना प्रकार की सामग्री नष्ट क्यों की जा रही है ? वह पूर्णकाम होने से ही निराकार है तो फिर बिना शरीर के काम वाला होकर आपकी यज्ञ में भाग कैसे ग्रहण करेगा ? क्या ये बुत परस्ती नहीं है ? अगर मन्दिर में मूर्ति है, तो मस्जिद में आप एक ही निश्चत दीवार के ही आश्रित एक दिशा में क्या करते हो ? वह तो सर्वत्र है, मस्जिद, चर्च आदि की क्या आवश्यकता है ? तुम तो हमसे भी अधिक बुत परस्त हो ।
श्रुति कहती है ‘अन्नं वै ब्रह्म’ अन्न ब्रह्म है क्योंकि अन्न से ही सभी प्राणी उत्पन्न और नष्ट होते हैं और अन्न ही स्थिर अर्थात जीवित रहते हैं । अब प्रश्न यह उठता है कि अन्न क्या, गेहूं, चावल, दाल आदि ही है ? नहीं ! यही अन्न नहीं हो सकता है । जिससे जीवन धारित होता है वही अन्न है । सुवर का अन्न विष्ठा है, शेर का मांस अन्न है, अर्थात यह सभी ब्रह्म है, तो फिर आप इन्हें भी ग्रहण क्यों नहीं करते ? क्योकि आपका परमेश्वर तत्त्व तो एकमात्र निराकार और व्यापक है । आपके द्वार से कोई भूखा चला जाये, वह ब्रह्म नहीं है और अग्नि में संपत्ति का स्वाहा ब्रह्म है ?
हम धन्य हैं कि हमारा परमेश्वर तत्त्व सगुण-साकार भी है और निर्गुण-निराकार भी है । और वह हृदय गुहा में अर्थात बुद्धि में ही रहता है। तात्पर्य यह कि विवेक की प्रधानता वाला ही हमारा सनातन एवं शाश्वत ज्ञानस्वरूप परमेश्वर तत्त्व है । हम परमेश्वर तत्त्व को को सुवर को जीवन देने वाली विष्ठा में भी उसके आहार के रूप में परमेश्वर तत्त्व की जीवनी शक्ति को देखते हैं, तो मंदिर आदि में लगने वाले छप्पन प्रकार के व्यांजनों में संपूर्ण आस्थावान् की मन की प्रसन्नता के श्रोत के रूप में भी देखते हैं । हमारे रोने, हंसने, संकेतों और समझ के प्रकार एक जैसे हैं, इनमें विश्व के किसी भी प्राणी में भिन्नता नहीं दिखती है । भय और प्रेम पशु-पक्षियों में भी एक ही भाषा-शैली में देखा जाता है । यहां किसी लिपि की आवश्यकता नहीं होती है । यही है हमारे व्यापक परमेश्वर तत्त्व के सभी प्राणियों में एकरूप से स्थित होने का प्रमाण । यह जो आत्मा में एक ही लक्षण में संपूर्ण प्रतिक्रायाएं बिना किसी भाषा के देखने में आ रही है, यही प्रमाण उसके गुणवान होने का प्रमाण है, जैसे धनवान धन का स्वामी होने के कारण धनवान होता है, वैसे ही वह परमेश्वर तत्त्व गुणों का स्वामी होने से गुणवान है । इस प्रकार जैसे धनवान धन से भिन्न है फिर वह धनी है, इसी प्रकार परमेश्वर तत्त्व से गुणों से भिन्न होकर भी गुणी अर्थात सगुण है । इसी को गीता में कहा—
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्यमीक्षते
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम् ॥१८/२०॥
संपूर्ण प्राणी जो अलग अलग भाषा, अलग अलग आकृति यानी शरीरों में वालें भिन्न भिन्न दिखते हैं तथापि उन सब में एक अखंडाकार अविनाशी परमसत्ता को देखता है वही सात्त्विक बुद्धि है अर्थात परमसत्ता का जिस बुद्धि में प्रकाश होता है, जिस परम प्रकाश का अनुभव करके मुक्त हो जाता है वह एक और अविनाशी परमसत्ता और कोई नहीं स्वसंवेद्य आत्मा ही है । जो आत्मा को तामस, राजस, सात्त्विक इन तीनों गुणों को के स्वामी के रूप में स्वयं को जान लेता है वही ब्रह्मतत्त्व को जानने वाला और परम कैवल्य मोक्ष को प्राप्त करता है । इसी तामस, रजस और सत्त्व को गीता में अधिभूत, अधिदैव, और अधियज्ञ के रूप में और आत्मतत्त्व को इन तीनों से ही भिन्न कहा गया है—
साधिभूताधिदैवं मां सधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥७/३०॥
यह है परमेश्वर का समग्र रूप, इससे भिन्न चाहे वे निराकार के उपासक हों अथवा साकार के उनके लिए गीता कहती है—
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८/२२॥
अर्थात वह परमेश्वर तत्त्व साकार ही है,अथवा निराकार ही है, इस प्रकार की ‘इदंन्ता’ ही ही रजोगुण और तमोगुण का लक्षण है । इसीलिए भगवती श्रुति कभी ‘इदन्ता’ करके परमेश्वर तत्त्व का बोध नहीं कराती है । वह सदैव ‘नेति नेति’ का ही उद्घोष करती हैं, सदैव उसको जानने का एक ही स्वरूप वर्णन करती है कि वह ‘स्व’ से अभिन्न है अतः अभिन्न करके ही जानो । इसी को गीता कहती है— आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ॥६/३२॥ इस प्रकार व्यापक परमेश्वर तत्त्व को वासुदेवः सर्वम् करके जानने वाला ही शास्त्र वेत्ता मर्मज्ञ है । वह न एक है और न दो अर्थात अनेक इसीलिए उसे अद्वितीय— एकमेवाद्वितीयम् कहते हैं । यही सर्वरूपता ही उसका स्वरूप है । उसे किसी लिपि आदि में बांधकर साकार, निराकार का अहं पालने वालों से साधकों को बचना चाहिए । मात्र लक्ष्य पर स्वयं को केंद्रित करना यही वैदिक धर्म और संसार चक्र से मुक्ति का हेतु है । उसे किसी बंधन में बांधकर कभी मुक्त नहीं हो सकते । ओ३म् !

टिप्पणियाँ